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क्या हो गए हम

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज पूरी तरह बिखरे तुम
        
                                                    
                            
इंसानियत से हटे तुम,
धर्मों में बंटे तुम ,
जो नहीं करना था ,
वो सब कुछ किए तुम ।
शिक्षा से हटे तुम,
कहनी में फंसे तुम ,
`क्या` से `क्या` हो गए तुम ।
 
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।  आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 वर्ष पहले
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Updesh Kumar

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