न जाने कौन से साझमें, हमें ढल जाना है
यह शख्सियत रखो जिंदा, शरीर तो जल जाना है
बादलों से कह दो की, आज होने पर गुमान ना करें
सूरज का क्या है, उसे तो कल भी निकल आनाहै
मुश्किलों का दौर है, उम्र आता जाता रहेगा
खानी है ठोकर तुमने, और फिर से संभल जाना है
वक्त के हिसाब से, ख्वाहिशों को समेंट के चलना सीखो
दबे अरमानों का क्या है, इन्हें फिर से मचल जाना है
कितना ही जमा लो तुम, नफरत की बर्फ सीने में
पानी के दो बूंद से, उसको भी पिघल जाना है
इश्क के दिल्लगी का, भी कोई भरोसा नहीं
आज टूट के बिखरा है, कल फिर से फिसल जाएगा