तुम निरंतर सोचते क्यों,
कब-कहाँ शुरुआत होगी?
मंज़िल कहाँ हमको मिलेगी,
या रास्ते में रात होगी?
राह में ठहरें कहीं या फिर
कहीं विश्राम कर लें,
धूप सर पर चढ़ गई है,
क्या छाँव में आराम कर लें?
कालनेमि मन तुम्हारा
पथ भ्रमित करता रहेगा,
आसान राहों को तुम्हारी
राह में फलता रहेगा।
उन नदी से कौन पूछे,
वो कहाँ को जा रही है?
बह रही है और बहती,
वो निरंतर जा रही है।
जो नदी की धार-सा
नित-नियत बहता रहेगा,
सब्र-सबरी की तरह जो
कर्म ही चुनता रहेगा।
फिर एक दिन सर पर तुम्हारे
जीत का सेहरा सजेगा,
खिलखिलाकर धूप-सा
तब तुम्हारा चेहरा खिलेगा।
याद आएगा नहीं तब,
कब-कहाँ था शूल-काँटा,
न याद तुमको आएगा
पग धूल थे या धूल माथा।
— रोहित तिवारी