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नज़्म: माँ की क़ुर्बानी

Rohit Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चलती है जब हवा तो दवा याद आती है,
        
                                                    
                            
मुश्किल में मुझे माँ की दुआ याद आती है।

वो अपनी भूख-प्यास का क़िस्सा नहीं कहती,
बच्चों को खिला कर ही उसे चैन है आता,
परदेश में जो हाथ से खाता हूँ निवाला,
माँ के उस गीले आंचल की वफ़ा याद आती है।

जब मेरे बदन पर कोई ख़रोंच है आती,
तड़प उठती है वो, जैसे जान निकल जाए,
वो रात भर जागती है मेरी एक चीख़ पर,
मुझे अपनी हर सांस में वो ख़ुदा याद आती है।

उसे मंजूर है अपने बदन की हर एक तकलीफ़,
पर मेरे माथे पर शिकन देख नहीं सकती,
ख़ुद भूखी सो गई वो कई बार रात को,
मगर मेरे हिस्से की निवाले की सदा याद आती है।

— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
5 घंटे पहले
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