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माटी का महायोद्धा - भाग 2

Rohit Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            फटी बिवाइयाँ पैरों की भी जिसको कभी न थकाती हैं,
        
                                                    
                            
वो पथरीली राहें भी जिसके आगे शीश झुकाती हैं।

ऊसर और चट्टानी धरती जिसका लोहा मानती है,
वो कठोर चट्टानें भी जिसकी ज़िद से टूट जाती हैं।

फटे-पुराने वस्त्रों में जो स्वाभिमान को सजाता है,
वो अभाव की आंधी भी जिसके बल से सहम जाती है।

खून को अपने पानी कर जो खेतों की प्यास बुझाता है,
वो सूखी पगडंडी भी जिसकी आहट पा मुस्काती है।

बाज़ारों की मंदी भी जिसका हौसला तोड़ न पाती है,
वो अटूट सब्र की ताकत ही हर मुश्किल से जीत जाती है।

कड़कड़ाती रातों की ठंड भी जिसका तन न कँपाती है,
वो बर्फीली रातें भी जिसकी निष्ठा से हार जाती हैं।

सूरज की तपन तपे पर जो खेतों में डटा ही रहता है,
वो जेठ की झुलसती धूप भी जिसकी दासी बन जाती है।

कर्ज़ के बोझ तले दबकर भी जो सदा मुस्कुराता है,
वो साहूकार की चौखट भी जिसके धीरज से डगमगाती है।

सूखे की काली छाया भी जिसकी उम्मीद न छीन सकी,
वो सावन की सूखी घटा भी जिसकी आँखों को देख लजाती है।

आधुनिकता की चकाचौंध में जो अपनी संस्कृति बचाता है,
वो मिट्टी की सोंधी महक ही जिसकी रग-रग में समाती है।

त्याग की ऐसी मूरत जो हर पल सुख-चैन बिखेरती है,
वो महायोद्धा की तपस्या ही जग का भाग्य विधाता कहलाती है।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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3 महीने पहले
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