खोखले वादे चुनावी, हर जगह ही दिख रहे,
सिर्फ़ काग़ज़ पर विकासों के मुक़द्दर लिख रहे।
पेट ख़ाली है मगर महंगाई की मारें मिलीं,
झूठ के बाज़ार में तो रोज़ ही वादे खिले।
डिग्रियां हाथों में लेकर घूमते हैं नौजवान,
मंच पर बैठे हुए पर मुस्कुराते हुक्मरान।
सत्य जो बोले यहाँ वो जेल के अंदर मिले,
चाटुकारों को यहाँ पर सुख-सुविधा के घर मिले।
टैक्स की वसूली कड़क है, रास्ते टूटे पड़े,
अफ़सरों के ठाठ देखो, लोग संकट में खड़े।
रोज़ भाषण में नए ही ख़्वाब बुनते जा रहे,
और हक़ीक़त में यहाँ बस आम जन ही रो रहे।
धर्म कुर्सी है इनका, कर्म कुर्सी ही यहाँ,
भूख से बेहाल जनता, जाएँ अब बोलें कहाँ।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'