जो केवल शब्दों को नहीं, जीवन के अर्थों को रचता है,
जो मौन रहकर भी शिष्यों के कोलाहल को पढ़ता है।
जो कुहासे से ढके रास्तों पर खुद मशाल बन जाता है,
जो गिरते हुए आत्मविश्वास को थामकर फिर चलना सिखाता है।
जो केवल मस्तिष्क को नहीं, मानवीय संवेदनाओं को सींचता है,
जो भटकती हुई ऊर्जा को मर्यादा की परिधि में खींचता है।
जो परीक्षा के अंकों से परे, चरित्र का मूल्यांकन करता है,
जो हर खाली और अबोध मन में, जिज्ञासा का रंग भरता है।
जो भूतकाल के अनुभवों से, वर्तमान का निर्माण करता है,
जो आने वाले भविष्य के हाथों में, राष्ट्र का भाग्य धरता है।
जो खुद एक ही स्थान पर रहकर, औरों को शिखर तक पहुँचाता है,
जो दूसरों की सफलता में ही, अपनी सार्थकता और गौरव पाता है।
— रोहित शर्मा भारद्वाज