विज्ञापन

इंसाफ़ के बाज़ार में, बिकती ये दुनिया।

Rohit Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ये रुपयों की बस्ती, ये चालों का मेला,
        
                                                    
                            
सड़क पर है भूखा, अकेला-अकेला,
दिलों में है मैल और आँखों में पर्दा,
ये अपनों की है अब, बदलती सी दुनिया।
अगर ये बची है, तो इस को मिटा दो,
हटा दो ये दुनिया, जला दो ये दुनिया।

यहाँ सीधे-साधों को सूली चढ़ाना,
रुला कर किसी को, फिर पैसा कमाना,
फंसाते हैं जालों में अपनों को चुनकर,
बिना बात के बस, नया ज़ख्म पाना।

जहाँ मन के रिश्ते, खिलौने बने हैं,
भरोसे को पैरों से, कुचलती ये दुनिया।
अगर ये बची है, तो इस को मिटा दो,
हटा दो ये दुनिया, जला दो ये दुनिया।

मदरसों-घरों की, शर्म को गिराया,
मर्यादा को उसने, ज़मीं पर सुलाया,
जो महफ़िल में खुद को, शरीफ़ कहते हैं,
अँधेरे में उनका ही, मन है कीचड़।

ये गंदी सी चाहत में, जलती ये रूहें,
हैवानियत का ही, दम भरती ये दुनिया।
अगर ये बची है, तो इस को मिटा दो,
हटा दो ये दुनिया, जला दो ये दुनिया।

जहाँ ज्ञान की बात, होती थी कल तक,
वहाँ ज़हन में फैलती भूख अब तक,
ये मासूम बचपन, हुआ बेसहारा,
किताबों से दूर,इस दिखावे की हद तक।

संस्कार सब इस, नशे में बहे हैं,
ज़हर जो पन्नों से, है उगलती ये दुनिया।
अगर ये बची है, तो इस को मिटा दो,
हटा दो ये दुनिया, जला दो ये दुनिया।

जो कुर्सी पे बैठे, वो अंधे और बहरे,
हैं ज़ालिम के चेहरे पे, रहमत के पहरे,
ग़रीबों की क़िस्मत का, सौदा है होता,
यहाँ बिक गए हैं, ये नियम गहरे।

ये ढांचा जहाँ का, अंधा हुआ है,
इंसाफ़ के बाज़ार में, बिकती ये दुनिया।
अगर ये बची है, तो इस को मिटा दो
हटा दो ये दुनिया, जला दो ये दुनिया।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
3 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Updesh Kumar

12570 कविताएं

View Profile

Sudhir Khatri

562 कविताएं

View Profile