शांत समंदर जैसी गहरी भीतर एक कहानी है,
जिसमें बहता यादों का यह अंतहीन सा पानी है।
लहरें उठकर छूना चाहतीं अम्बर के उस छोर को,
तोड़ रही हैं जो सदियों से एकांकित इस शोर को।
तपन धूप की सहकर ही तो बादल नव-आकार लें,
कष्टों से तपकर ही सारे अनुभव नया निखार लें।
बिना टकराए पाषाणों से झरना कहाँ मचल पाता,
मौन पड़ा जो राह में पत्थर, राहगीर को क्या सिखाता?
घोर निशा के सन्नाटे में जो चुपचाप सुलगता है,
भोर भये वह रवि बनकर ही अंधकार को डसता है।
तट पर बैठे रहने से तो नैया पार नहीं होती,
बिना लड़े तूफ़ानों से पतवार तैयार नहीं होती।
पंख पखेरू के उड़ते हैं छूने नील गगन को ही,
छोड़ चले हैं पीछे अपने वे उस शांत भवन को ही।
सीमाओं के बंधनों में जो घिरा रहा वह रोया है,
साहस जिसने भी छोड़ा उसने सर्वस्व ही खोया है।
भीड़-भाड़ की इस दुनिया में खो जाता जो अपनापन,
मौन बैठ एकांत घड़ी में उसे ढूँढता है यह मन।
वाणी जहाँ थक जाती है तब मौन ही राग जगाता है,
हृदय तंत्री का तार-तार तब झंकृत ही हो जाता है।
सुख-दुख के दो पाटों में यह जीवन चक्र चला करता,
धैर्यवान राही ही जग में हर एक झोंके को सहता।
मिट्टी में मिलकर ही तो कोई बीज वृक्ष बन पाता है,
त्याग और तप के बल पर ही इतिहास नया रचा जाता है।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'