मोहब्बत को रुलाया था किसी ने
हमें भी आज़माया था किसी ने
ज़माने में किसी से दिल लगा कर
किसी का दिल दुखाया था किसी ने
उजालों को तरसते हैं अभी तक
कभी जुगनू बुझाया था किसी ने
मसर्रत से जुदा कर पास मेरे
उदासी को बिठाया था किसी ने
बिछड़ने का इरादा हम न समझे
बहाना तक बनाया था किसी ने
उसे हम भूल भी जाएँ तो कैसे
हमें दिल में बसाया था किसी ने
इसी मा'सूमियत पर मर मिटे हम
किया वा'दा निभाया था किसी ने
हथेली पर हमारा नाम लिख के
रक़ीबों को दिखाया था किसी ने
- रोहित गुस्ताख़