मैं आफ़ताब था, जलना मुझे भी ज़रूरी था.
पागल घटायें थी, बरसना उन्हें भी ज़रूरी था.
तबस्सुम तो हुआ उन्हें, मुझे छुपाने का,
मेरा चुप रहना भी ज़रूरी था,
उन्हें खुश करना भी ज़रूरी था.....
वो बूँदों की लड़ी बनके दिखे,
समन्दर मुझे भी बनना था,
एक कश्ती मुझे भी ज़रूरी थी,
एक साहिल उन्हें भी ज़रूरी था.......
उनके ही ख़ातिर रुख़ अख़्तियार किया,
ये जहां जीत जाने का,
ये जताना भी ज़रूरी था.
ऐतबार करना भी ज़रूरी था.......
-RISHIKESH YADAV
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