दुकानें बंद थीं,
हुकूमत थी किसी की,
खुशियाँ चंद थीं।
लावारिश सी थीं दीवारें,
दरारें बुलंद थीं।
अब सहम कैसे गए दिन,
जगी रात अतरंग थी।
शायद राजनीत दस्तक़ दे दी,
माकूल फ़िज़ाएँ बदरंग थीं।
चमकते नैन झर्झर कैसे?
बेमिसाल ख़्वाहिशें पंक थीं।....-RISHIKESH YADAV
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