ना मैं माँपूं प्यार को तेरे,
तूं करती दिन–रात याद या नहीं?
मैं तेरे होंठों पे आया बन्नो,
बनके गुड़ का मिठास या नहीं?
तेरी यादों में खोया मन,
रास भी रचाए, तूं चैन ले भगी,
मन्नत मांगे न दिल अब कोई,
कि मेहंदी हाथों में तेरी मेरे नाम की लगी।
नज़रों से अपनी, सूरत की
मेरी छवियाँ समेट लीजिए,
फूलों सा दिली भौरों को,
बाहों में आराम दीजिए,
आपकी फरमाइशों में गुमशुदा,
इक नींद मेरी सोके भी रातें जगने लगी,
बेचैनियाँ समेट हर,
मेंहदी हाथों में मेरी आपके नाम से सजी।
है लगे होंठो को तेरी बिगड़ा देखकर,
बादलों से चांद रूठा हुआ है,
आहट से मेरी जान लो, आ मानने
जिस्म को तुम्हारे मैंने छुआ है,
ये छुअन स्पर्श है, फूल का
डालियों से मधुर, या कहूं है दिल्लगी,
चूमता उन रंग को,
मेंहदियां हाथों में तेरी जो मेरे नाम की लगी।
– ऋषभ भट्ट