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गांव की दिवाली

Rishabh Bhatt

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            शहरों में काफी मना ली,
        
                                                    
                            
याद आती है गांव की दिवाली,
बोनस की आस में हाथ खाली,
याद आती है गांव की दिवाली।

कह दो कम्पनी वालों से,
रुपयों में खोए, अनजाने–मतवालों से,
एक घर हमारा भी है,
हमपे उन खुशियों का सहारा भी है,
कि जिनके पास आज भी जा नहीं पाया,
बैठ जिनके संग एक दीप न जलाया,
फुलझड़ी–पटाखे उनकी हँसी में शामिल हो सके,
हम आज भी काम करने से न थकें,

बोनस की आस में फिर भी हाथ खाली,
याद आती है गांव की दिवाली।

कोई कहता है रात होने पर मिलीं,
चेहरे पर थोड़ी हँसी खिली,
पाँच सौ रुपए की एक कड़क नोट,
एक इंडेक्स, गांव की भाषा में खाना बनाने वाला रोबोट,
इसी के लिए घर आज जा नहीं पाया,
लालच ने हमें ऐसा भरमाया,
पर ये लालच नहीं मजबूरी है,
कि जिसका नाम ही मजदूरी है,

ये मजूरी आज की हमने कमा ली,
याद आती है गांव की दिवाली।

मेरे दोस्तों का कॉल आया था,
बातें हुईं, सीको हमने शरारतों में जलाया था,
वो बचपन बड़ा प्यारा था यार,
दीपों के रौशनी की दिल तक बाहर,
दिले–गर्दिश कि अब दिवाली ही पहचानता नहीं,
सालो–साल काम के सिवाय कुछ जनता नहीं,
थके हुए इन सब को काश छुट्टी मिल पाती,
पगार, बोनस की दीवारें दिवाली से न टकरातीं,

दो चार फुलझडियां हमने खुशी से जला ली,
याद आती है गांव की दिवाली।
– ऋषभ भट्ट
11 महीने पहले
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