हे मर्यादा के शिखर नवीन
कहाँ छिपे हो राम प्रिय,
निज सुत भी दुत्कार रहा
प्रतिपल देता श्राप मुझे,
वनवासी बनकर तू निकला
पर काँटों में मुझको छोड़ गया,
सूर्य-चंद्र भी लज्जित मुझसे
तुझको जो वनवास दिया ।।1।।
तुझे मिला ईश्वर सिंहासन
मुझे तो केवल श्राप मिला,
सुना भरत को राम कहानी
निश्चय ही मंगल होगा,
धिक्कार तुझे ऐ पापिन कहकर
उसने भी मेरा तिरस्कार किया,
भरत विलाप तो सुना तुमने
पर मेरा विलाप दबा रहा ।।2।।
यदि होड़ हो जाए प्रेम की
तो कौशल्या भी पीछे हैं,
नेत्र उसके सजल सर्वदा
मुझ-सा कहाँ पाषाण हृदय,
तू निकला वनवासी होकर
प्रिय अनुज को साथ लिए,
सुमित्रा के क्रंदन को
मैंने ही विस्तार दिया ।।3।।
दोषी मैं हूँ इस झूठे जग की
चलता करवट लेकर खुद की,
द्रोही राम मैं तेरी हूँ
दण्डित करना इस दोषी को,
भले विमुख हो जाऊँ तुझसे
पर तू न होना तर्पण मुझसे ।।4।।
निष्ठुर हृदय धिक्कार इसे
शब्द कहाँ से लाऊँ मैं,
करुणा के, हे भवसागर!
तुम तो हृदय पाठ पढ़ लेते हो
सौगंध तुम्हें है शबरी की
चक्षु ही अब सहारा हैं ।।5।।
लीला तेरी सुनी बहुत है
विभीषण को भी स्थान दिया,
विभीषण जैसा भाग्य कहाँ?
जो सम्मुख तेरे होऊँ मैं,
रवि छवि से तिरोहित होऊँ
राम वचन दिया तुझे,
न ढूँढना इस पाषाण हृदय को
अब खुद को ही वनवास दिया ।।6।।