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उन...का क्या?

Ravi Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उन धागों का क्या? जिनकी मन्नतें अधूरी रह जाती है,
        
                                                    
                            
बोझ बनकर बस एक बांस से लिपट जाते है।

उन टूटे-फूटे नारियलों का क्या?
जो हर बार किसी विश्वास से तोड़े जाते है।

अपनी शाख से जुदा हुए उन बेलपत्रियों का क्या?
जो मंजिल तक जाने से पहले ही दम तोड़ जाते है।

उन बेजुबान फूलों का क्या?
जिन्हें चरण के नाम पर कदमों से रौंदा जाता है।

उन आहुतियों का क्या?
जिन्हें रक्तसंचित कर अग्नि को सौंप दिया जाता है।

उन दीयों का क्या ?
जो अँधेरे में उम्मीद बनकर टिमटिमाते हैं,
पर सुबह होने से पहले ही बुझ जाते हैं।

उन पैरों का क्या ?
जिनमें सदियों के सफर से दरारें चमक आती है।

उन प्रार्थनाओं का क्या ?
जो होठों तक आकर लौट जाती है।

उन निस्वार्थ आस्थाओं का क्या?
जो अनुत्तरित प्रतिक्षा बन कर रह जाती है।

उन निश्छल अश्रुओं का क्या?
जो समंदर सा होकर भी दरिया में समा जाते है।

अंतर्मन में उठे उन सिसकियों का क्या?
जो होठों की सुर्खियों पर मुस्कान बन जाते है।

उन रिश्तों का क्या?
जो एक तरफ़ा समर्पण की माला बनाकर छोड़ दिए जाते है।

उन...का क्या?
- रवि
2 महीने पहले
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