सतरंगी तेरी परछाईं मुझे क्यों दिख रही है,
क्या तुम इंद्रधनुष के पास खड़ी हो, या कोई शाम खिल रही है?
तेरी आँखों में दिवाली की शाम लिख दूँ क्या,
हर चमकती हुई लौ में तेरा नाम लिख दूँ क्या।
तेरी पलकों पे ठहरी है जो बारिश की नमी,
उसमें चाँद का कोई पैग़ाम लिख दूँ क्या।
तेरे चेहरे पे जो ठहरी है उजाले की लकीर,
उसे अपनी किसी ग़ज़ल का अंजाम लिख दूँ क्या।
अगर तू इंद्रधनुष के पास खड़ी है आज,
तो अपनी साँसों को भी रंगों के नाम लिख दूँ क्या।
तू बस एक बार नज़र उठाकर देख तो सही,
मैं तेरी आँखों में अपना पूरा आसमान लिख दूँ क्या।
-रतन कुमार कैथवास