कितने अरमानों को तुमने ख़ामोशी से दफ़्न कर डाला,
कितने सपनों को हक़ीक़त का नया चेहरा बना डाला,
कितनी मंज़िल सामने हैं, कितने रास्ते खो गए हैं,
कितनी आँखों में अभी भी जीत का विश्वास शेष है?
कितने काँटों पर चले हो, कितने ज़ख़्मों को सहेजा,
कितनी रातों से लड़े हो, कितना ख़ुद को ही समेटा,
वक़्त ने छीना बहुत कुछ, वक़्त ने परखा बहुत है,
फिर भी सीने में धड़कता कौन-सा एहसास शेष है?
ज़िंदगी की धूप में कितनी उमंगें जल गई हैं,
कितनी उम्मीदें समय की आँधियों में ढल गई हैं,
फिर भी मन के किसी कोने में कोई दीपक तो होगा,
उस बुझी लौ में अभी कितनी ज़रा-सी आस शेष है?
तुम बताओ, हारकर भी क्या कभी रुकना पड़ा है?
टूटकर भी क्या तुम्हें ख़ुद से कभी लड़ना पड़ा है?
जो समय के साथ बदले, वो समय का रंग होगा,
देखना है, तुममें अब भी कितना प्रतिरोध शेष है।
कल की ख़ातिर आज को यूँ व्यर्थ मत जाने देना,
अपने सपनों को निराशा में न मुरझाने देना,
वक़्त की फ़ितरत बदलना तो किसी के हाथ में नहीं,
पर तुम्हारे हौसलों में, कितना आकाश शेष है?
तुम बताओ, राख में चिंगारियाँ कितनी बची हैं?
तुम बताओ, आँख में तैयारियाँ कितनी बची हैं?
वक़्त चाहे जिस तरफ़ भी मोड़ ले अपनी कहानी,
तुममें ख़ुद अपनी कहानी लिखने की कितनी प्यास शेष है?
-रतन कुमार कैथवास