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मन में कितने दीप जले हैं, फिर भी आँखों में रात बहुत है

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हर सपने में गीत बहुत है, आने की उम्मीद बहुत है,
        
                                                    
                            
सूनी आँखों में भी देखो, कल की एक उम्मीद बहुत है।
दावानल को संभाल तू पहले, तूफ़ानों की चाल समझ ले पहले,
फिर कहना क्यों मन में इतनी, बेचैनी की बात बहुत है।

क्यों धड़कन के अंदाज़ अलग हैं, साँसों के भी राज़ अलग हैं,
एक ही दिल में जाने कितने मौसम के आगाज़ अलग हैं।
सुर में भीगी-भीगी कब से, बाँसुरी की आवाज़ अलग है,
जैसे चुपके से कोई कहता… तेरे लिए एक साज़ अलग है।

रात अँधेरी चाहे जितनी, चाँद कहीं तो जाग रहा है,
टूटा तारा भी आकाश में अपना कोई भाग रहा है।
लहरों से मत पूछ किनारा, पहले सागर की गहराई जान,
हर तूफ़ान के पीछे छुपा, ये साहिल का अंदाज़ अलग है।

मन में कितने दीप जले हैं, फिर भी आँखों में रात बहुत है,
होठों पर मुस्कान सजी है, भीतर कोई बात बहुत है।
दावानल को राख न समझो, इसमें जंगल का जीवन है,
जलने वाले हर मौसम का, फिर से खिलने का राज़ अलग है।

हर सपने में गीत बहुत है, हर गीत में एहसास बहुत है,
बाँसुरी की एक तान में भी जाने कितनी प्यास बहुत है।
तूफ़ानों की चाल समझ ले, फिर अपनी धुन में आगे बढ़,
राह भले ही कठिन बहुत हो, मंज़िल का विश्वास बहुत है।
-रतन कुमार कैथवास
एक महीने पहले
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