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मैं शंकर की भस्म हूँ जैसे

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं जीवन की भागदौड़ हूँ,
        
                                                    
                            
तुम तो जैसे कोका-कोला हो,
मैं शंकर की भस्म हूँ जैसे,
तुम मंदिर की शंख-ध्वनि हो।

मैं तपती दोपहरी का रास्ता,
तुम सावन की पहली फुहार हो,
मैं उलझी हुई कोई पहेली,
तुम हर सवाल का जवाब हो।

मैं शहर की भीड़ में खोया हुआ,
तुम गाँव की पगडंडी की शांति हो,
मैं माथे पर चिंता की लकीर,
तुम होंठों पर ठहरी मुस्कान हो।

मैं अधूरी-सी कोई ग़ज़ल,
तुम उसका सबसे सुंदर मिसरा हो,
मैं रात के सन्नाटे जैसा,
तुम सुबह का पहला उजाला हो।

मैं रूठा हुआ मौसम हूँ,
तुम मनाने वाली बहार हो,
मैं थका-हारा मुसाफ़िर हूँ,
तुम रास्ते में मिलता किनारा हो।

मैं राख में दबी हुई चिंगारी,
तुम पूजा की जलती लौ हो,
मैं जितना खुद में उलझा हुआ,
तुम उतनी ही सरल-सी बात हो।

मैं जीवन की सारी आपाधापी,
तुम उस आपाधापी में ठहराव हो,
मैं अगर अधूरा-सा आदमी हूँ,
तो तुम मेरे जीवन का इन्कलाब हो।

- रतन कुमार कैथवास
2 महीने पहले
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