आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मैं शंकर की भस्म हूँ जैसे

                
                                                         
                            मैं जीवन की भागदौड़ हूँ,
                                                                 
                            
तुम तो जैसे कोका-कोला हो,
मैं शंकर की भस्म हूँ जैसे,
तुम मंदिर की शंख-ध्वनि हो।

मैं तपती दोपहरी का रास्ता,
तुम सावन की पहली फुहार हो,
मैं उलझी हुई कोई पहेली,
तुम हर सवाल का जवाब हो।

मैं शहर की भीड़ में खोया हुआ,
तुम गाँव की पगडंडी की शांति हो,
मैं माथे पर चिंता की लकीर,
तुम होंठों पर ठहरी मुस्कान हो।

मैं अधूरी-सी कोई ग़ज़ल,
तुम उसका सबसे सुंदर मिसरा हो,
मैं रात के सन्नाटे जैसा,
तुम सुबह का पहला उजाला हो।

मैं रूठा हुआ मौसम हूँ,
तुम मनाने वाली बहार हो,
मैं थका-हारा मुसाफ़िर हूँ,
तुम रास्ते में मिलता किनारा हो।

मैं राख में दबी हुई चिंगारी,
तुम पूजा की जलती लौ हो,
मैं जितना खुद में उलझा हुआ,
तुम उतनी ही सरल-सी बात हो।

मैं जीवन की सारी आपाधापी,
तुम उस आपाधापी में ठहराव हो,
मैं अगर अधूरा-सा आदमी हूँ,
तो तुम मेरे जीवन का इन्कलाब हो।

- रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
16 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर