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मैं कब तक चाँद को आईने में देखता जाऊँ

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हर बार, कैसे मैं प्रसन्न हो जाऊँ,
        
                                                    
                            
तेरे ख़्वाबों को, हक़ीक़त कैसे मान जाऊँ,
तू तो आता है सिर्फ़, रात के अँधेरों में,
मैं सुबह के उजालों में, तुझे कहाँ पाऊँ,
बता, इस दिल को मैं कितना और समझाऊँ।

तेरी सूरत से ही, दिन मेरा सँवरता है,
तेरे दीदार को ये दिल, रात भर तरसता है,
तू ख़्वाबों में आकर, चला जाता है चुपचाप,
इधर तेरे इंतज़ार में, वक़्त ठहरता है,
ये कैसी उलफ़त है, जो दूरियों में पलती है।

हर बार तेरे आने पर, मुस्कुरा तो देता हूँ,
तेरी याद के फूलों से, दिल सजा तो देता हूँ,
मगर आँख खुलते ही, बिखर जाते हैं सारे रंग,
मैं टूटे हुए ख़्वाबों को, फिर उठा तो लेता हूँ,
पर हर दफ़ा ख़ुद को, कैसे मना तो लेता हूँ।

कभी हमें, अपना दीदार-ए-रुखसार करवा देना,
मेरी तन्हा रातों को, सहर बना देना,
बहुत देख लिया तुझे, पलकों के साए में,
अब सामने आकर, मुझे अपना बना लेना,
और मेरे इंतज़ार को, कोई अंजाम दे देना।

हर बार तेरे ख़्वाब पर, जश्न कैसे मनाऊँ,
बिन तेरे दीदार के, मैं ख़ुद को कैसे बहलाऊँ,
मोहब्बत सिर्फ़ तसव्वुर का नाम तो नहीं,
मैं कब तक, चाँद को आईने में देखता जाऊँ,
तू सामने भी आ, कि मैं तुझे अपना कह पाऊँ।
-रतन कुमार कैथवास
एक घंटा पहले
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