विज्ञापन

जितना गहरा हो, उतना ही मजबूर होता है

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ऐ समंदर की बेकाबू लहर,
        
                                                    
                            
तुम किनारों से रहती दूर क्यों हो,
अपने आप को समझती क्या हो,
इतना आखिर मगरूर क्यों हो?

हर बार लौटकर उसी साहिल को आती हो,
फिर उससे मिलने को इतनी मजबूर क्यों हो?
छूना चाहती हो उसके कदमों को,
फिर अपने ही वेग पर इतना ग़रूर क्यों हो?

तूफ़ानों से रिश्ता है तुम्हारा,
फिर चाँदनी रात में इतनी मजबूर क्यों हो?
पत्थरों से टकराकर शोर मचाती हो,
फिर रेत पर आकर इतनी चुपचाप क्यों हो?

किनारा कभी तुम्हें बाँधता नहीं,
फिर उसके नाम से इतना मशहूर क्यों हो?
दूर रहकर भी उसी की ओर बहती हो,
फिर कहती हो कि उससे दूर क्यों हो?

शायद प्यार भी समंदर जैसा होता है,
जितना गहरा हो, उतना ही मजबूर होता है।
लहर चाहे जितनी बगावती हो जाए,
हर बार साहिल पर आकर चूर होता है।

- रतन कुमार कैथवास
3 दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

kamlesh ranjan

1 कविता

View Profile