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गीत बहुत है

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इस धरती पर रीति बहुत है,
        
                                                    
                            
मन में मेरे गीत बहुत है।

लोगों ने बाँध रखे हैं अपने-अपने मतलब के रिश्ते,
मेरे हिस्से मगर दर्शन नीति बहुत है।

जिसे समझना है, वो ख़ामोशी भी पढ़ लेगा,
हर बात कहूँ… इतनी भी क्या जीत बहुत है।

दुनिया भर के मेले देखे, फिर भी इतना जाना,
भीड़ बहुत है दुनिया में, अपना मन मीत बहुत है।

जो मिला उसे बाँट दिया, जो बचा उसे जी लिया,
मेरे पास भले कम है, पर जीने की रीत बहुत है।

तुम सौ इल्ज़ाम लगाओ, मैं मुस्कुराता रहूँगा,
मेरी ख़ामोशी में भी जवाब देने की नीति बहुत है।

किसी के दर पे जाकर अपनी कीमत क्या आँकूँ,
मेरे भीतर ही मेरा सम्मान… मेरी जीत बहुत है।

इस धरती पर रीति बहुत है,
पर मेरे मन में अभी भी गीत बहुत है।
-रतन कुमार कैथवास
एक महीने पहले
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