सितम नहीं सह सकता अब वो, जान गया है हलचल सारी,
दरिया से तूफ़ान उठा है, काँप उठी है धरती सारी।
मन में कितने उपवन खिले हैं, फिर भी मन बेचैन बहुत,
सोचे सौ-सौ बार अकेला, किससे कह दे पीड़ा सारी।
चुप था अब तक, चुप रहने की भी एक हद होती है,
सीने में जब आग सुलगती, आँख कहाँ फिर सोती है।
जिसने समझा मौन को कमजोरी, उसको अब समझाना है,
लहर किनारे चुप रह जाए, सागर में गहराई होती है।
अब न कोई दर्द छुपेगा, अब न कोई बात दबेगी,
जितनी आँधी रोकी थी वो, बनकर बिजली आज गिरेगी।
मन के सूने आँगन में अब, फिर से मौसम करवट लेगा,
जिस धरती ने दर्द सहा था, उसी पे हरियाली उगेगी।
कितने सपने आँखों में हैं, कितने अरमान पलते हैं,
कुछ फूल अभी भी मन के भीतर, चुपचाप मगर खिलते हैं।
सोच रहा है सौ-सौ बार वो, राह नई अब कौन चुने,
तूफ़ानों से जो लड़ते हैं, वही किनारे तक चलते हैं।
-रतन कुमार कैथवास