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धीरे धीरे अपना कर गई

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इसका इलाज कराओ, ये दिल की बात कह देती है,
        
                                                    
                            
कुछ सोचती नहीं पहले, जो दिल में आता है कह देती है।

लबों को ज़रा लगाम दो, ये राज़ खोल देती है,
जो बात दिल में आती है, वो बात बोल देती है।

नतीजे की फ़िक्र कम, बस जज़्बातों में बहती है,
जो मन में उठता है, वही आँखों से कहती है।

कभी लफ़्ज़ों से चुभ जाती है, फिर खुद ही रो देती है,
पहले तीर चला देती है, बाद में सोचती रहती है।

अजब सी बेबाकी है उसके अंदाज़-ए-बयाँ में,
दिल में जो भी पलता है, रख देती है ज़ुबाँ में।

न कोई बनावट थी, न लफ़्ज़ों में कोई चाल थी,
उसकी हर एक बात, मुझे धीरे-धीरे अपना कर गई।
-रतन कुमार कैथवास
2 घंटे पहले
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