हर नग़मों की अपनी चमक, अपनी कोई खनक होती है,
तेरे रुख़सार की इस ख़ामोशी में, फिर कमी किस बात की होती है।
तेरे चेहरे पे वो पुरानी-सी रौनक, नज़र क्यों नहीं आती,
किस धुन की कोई टूटी कड़ी, अब तक तुझे सताती?
क्या कोई संगीत अधूरा रह गया, कोई साज़ मुकम्मल न बन सका,
या दिल का कोई राज़ था, जो होंठों तक आकर भी कह न सका।
अपने दिल की बातें, हमसे बेख़ौफ़ होकर कह डालो,
जो गाँठें बरसों से बाँधी हैं, आज एक-एक करके खोल डालो।
हम बैठेंगे तेरे पास, हर दर्द की तहरीर पढ़ेंगे,
जहाँ राह बंद मिलेगी, वहीं कोई नई राह गढ़ेंगे।
कुछ तो रास्ता निकलेगा, कुछ तो कोई बहाना होगा,
सूनी पड़ी इन धड़कनों में, फिर कोई नया तराना होगा।
ऐसे हाथों में तलवारों को, जंग नहीं लगवानी है,
जब सामने मुश्किल खड़ी हो तो, हिम्मत भी दिखानी है।
जो लड़ाई दिल के भीतर है, उसे चुपचाप नहीं लड़ना है,
टूटी हुई उम्मीदों को फिर से, आवाज़ देकर गढ़ना है।
तू बस अपने दिल की कह दे, बाकी हम सँभाल लेंगे,
बुझते हुए इन साज़ों में, फिर सुर और ताल डाल देंगे।
कुछ तो करना ही पड़ेगा, यूँ ख़ामोश रहना ठीक नहीं,
जब दिल में अब भी जज़्बा है, तो हार मानना ठीक नहीं।
तेरे नगमों को हम तेरी बेलौस झंकार बना देंगे,
फिर से तेरे रुखसार पर एक नयी चमक होगी |
-रतन कुमार कैथवास