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आईना सुनसान कर गया

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वो गया तो धूप भी चौखट से लौटने लगी,
        
                                                    
                            
जैसे कोई मौसमों को भी बेईमान कर गया।

जिस राह पर उसके कदमों की आहट रहती थी,
वहीं अब ख़ामोशी का बसेरा कर गया।

एक चेहरा था जो शहर की रौनक हुआ करता था,
वो क्या गया, हर आईना सुनसान कर गया।

उसके जाने का असर इतना गहरा था मुझ पर,
मैं अपने ही घर में खुद को मेहमान कर गया।

जिसे भूलने की कोशिश में मैंने उम्र गुज़ार दी,
वो हर बार याद आकर दिल परेशान कर गया।

अब किससे पूछें उस शख़्स का पता यहाँ,
वो जाते-जाते हर निशाँ बेजान कर गया।
-रतन कुमार कैथवास
3 घंटे पहले
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