विज्ञापन

अहिल्याएं जब जाग उठें तो, युग की दिशा बदल सकती है

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अहिल्याएँ तो अब तक पत्थर बनी, गहरी नींद में सोई हैं,
        
                                                    
                            
युग बदले, शासन बदले, फिर भी आँखें नम न हुई हैं।
तम की चादर ओढ़े बैठी हैं, किसको अपनी पीर सुनाएँ,
द्वार-द्वार पर प्रश्न खड़े हैं, अपनी व्यथा किसे समझाएँ?
जब चेतना ही मौन पड़ी हो, दीप जलाने आए कौन?

राम की राह निहार रही हैं, पथरीली आँखों के साथ,
कब तक बीते युगों का बोझा, ढोती रहेंगी दिन और रात?
किसके चरणों की आहट से, टूटेगा यह जड़ अभिमान,
कौन सुनाएगा इनके भीतर, सोया हुआ स्वाभिमान?
पत्थर दिल संसार में इनकी पीर सुनाने आए कौन?

इनकी आँखों के सपनों पर, पहरे कितने बिठाए हैं,
जिन हाथों ने पंख दिए थे, उन्हीं ने पंख कटाए हैं।
मर्यादा के नाम पे आख़िर, कब तक बंधन ढोएँगी,
अपने हिस्से के सूरज बिन, कब तक अँधियारे बोएँगी?
अन्यायों के इस तम में, न्याय का दीप जलाए कौन?

केवल राम के आने से क्या, हर युग का उद्धार होगा?
जब तक मन में भेद बचा है, कैसे जग उजियार होगा?
हर इंसान बने जब प्रहरी, हर अन्याय का प्रतिकार करे,
हर सोई चेतना जागे, हर मन अत्याचार से लड़े।
मुक्ति का अर्थ समझे जग, ऐसी अलख जगाए कौन?

अहिल्याएँ जब जाग उठें तो, युग की दिशा बदल सकती है,
पत्थर जैसी जमी चेतना, फिर निर्झर-सी बह सकती है।
अपने भीतर राम जगाओ, अपने हाथों तम को हर लो,
दूसरों के उद्धार से पहले, ख़ुद में सोई शक्ति भर लो।
जब सब अपने दीप बुझाएँ, फिर जगमगाने आए कौन?
-रतन कुमार कैथवास
3 दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Prasoon Saxena

973 कविताएं

View Profile

Anil Pandey

515 कविताएं

View Profile