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कहानी मेरी

rashmi gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बड़ी महंगी पड़ी है मुझे कहानी मेरी
        
                                                    
                            
हकीक़त फिर भी किसी न जानी मेरी
बस चश्मे का चेहरा मुस्कुराहट का पहरा
जैसी थी वैसी किसी ने मानी मेरी
बड़ी महंगी पड़ी है मुझे कहानी मेरी

आवाजों से अक्सर में डरती रही
किवाड़ों से अक्सर में पिछड़ती रही
जमाने की चौखट ओर कल की लकीरें
निकलती रही इसी में जवानी मेरी
बड़ी महंगी पड़ी है मुझे कहानी मेरी

दुनिया के शीर्षक, बनाती रही
खुद को खुद से हराती रही
जमाने के लिए ज़माने बनाती रही
छोड़ते छोड़ते मिट गई निशानी मेरी
बड़ी महंगी पड़ी है मुझे कहानी मेरी
एक वर्ष पहले
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