बड़ी महंगी पड़ी है मुझे कहानी मेरी
हकीक़त फिर भी किसी न जानी मेरी
बस चश्मे का चेहरा मुस्कुराहट का पहरा
जैसी थी वैसी किसी ने मानी मेरी
बड़ी महंगी पड़ी है मुझे कहानी मेरी
आवाजों से अक्सर में डरती रही
किवाड़ों से अक्सर में पिछड़ती रही
जमाने की चौखट ओर कल की लकीरें
निकलती रही इसी में जवानी मेरी
बड़ी महंगी पड़ी है मुझे कहानी मेरी
दुनिया के शीर्षक, बनाती रही
खुद को खुद से हराती रही
जमाने के लिए ज़माने बनाती रही
छोड़ते छोड़ते मिट गई निशानी मेरी
बड़ी महंगी पड़ी है मुझे कहानी मेरी
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