सवालों से क्यों डरते हो?
आवाज़ों से क्यों डरते हो?
कलम उठी तो रोक रहे हो,
सच बोला तो टोक रहे हो।
छात्रों पर जब लाठी बरसी,
सड़कें जब जब जाम हुई,
सत्ता की कुर्सी काँप उठी
नींद चैन सब हराम हुई
क्या तुम डर गए?
अभी-नहीं…
शाम हुई और तुम घर गए!
लाठी आई, आँसू आए,
फिर भी नारे गूँज रहे हैं।
जिन्हें समझे थे तुम कमजोर,
वही सवाल पूछ रहे हैं।
तुमने सोचा—सब चुप होंगे,
तुमने सोचा—सब रुक जाएँगे,
पर ये छात्र हैं, साहब—
ये कल इतिहास बनाएँगे!
क्या तुम डर गए?
अभी-नहीं…
शाम हुई और तुम घर गए!
सत्ता सुन ले—
ये आवाज़ दबने वाली नहीं,
ये लड़ाई रुकने वाली नहीं।
सत्ता चाहे जितना जोर लगा ले
ये चिंगारी बुझने वाली नहीं
हक़ की जब आवाज़ उठी,
कुर्सी की नींव तमाम हुई।
सड़कों पर जब सैलाब आया
सत्ता की मुश्किल आम हुई।
क्या तुम डर गए?
अभी-नहीं…
शाम हुई और तुम घर गए!
हाथों में जब किताबें थीं,
आँखों में जब अरमान थे,
सवाल लिए जब छात्र खड़े,
क्यों उन पर इल्ज़ाम थे?
जिन्हें समझा था चुप कर देंगे,
उनकी आवाज़ सरेआम हुई।
जिन्हें समझा था रोक देंगे
उनसे सत्ता बदनाम हुई
क्या तुम डर गए?
अभी -नहीं…
शाम हुई और तुम घर गए!
जब छात्रों ने प्रश्न किया,
सत्ता की बोलती बंद हुई।
किताबें लेकर छात्र चले,
सत्ता की शिकस्त हुई।
लाठी आई, डर न आया,
छात्रों की आवाज़ जवान हुई।
सवालों से जब सत्ता घिरी,
हर चाल उसकी नाकाम हुई।
क्या तुम डर गए?
अभी-नहीं…
शाम हुई और तुम घर गए!