आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

क्या तुम डर गये? अभी नहीं, शाम हुई और तुम घर गए।

                
                                                         
                            सवालों से क्यों डरते हो?
                                                                 
                            
आवाज़ों से क्यों डरते हो?
कलम उठी तो रोक रहे हो,
सच बोला तो टोक रहे हो।

छात्रों पर जब लाठी बरसी,
सड़कें जब जब जाम हुई,
सत्ता की कुर्सी काँप उठी
नींद चैन सब हराम हुई

क्या तुम डर गए?

अभी-नहीं…
शाम हुई और तुम घर गए!

लाठी आई, आँसू आए,
फिर भी नारे गूँज रहे हैं।
जिन्हें समझे थे तुम कमजोर,
वही सवाल पूछ रहे हैं।

तुमने सोचा—सब चुप होंगे,
तुमने सोचा—सब रुक जाएँगे,
पर ये छात्र हैं, साहब—
ये कल इतिहास बनाएँगे!

क्या तुम डर गए?
अभी-नहीं…
शाम हुई और तुम घर गए!


सत्ता सुन ले—
ये आवाज़ दबने वाली नहीं,
ये लड़ाई रुकने वाली नहीं।
सत्ता चाहे जितना जोर लगा ले
ये चिंगारी बुझने वाली नहीं


हक़ की जब आवाज़ उठी,
कुर्सी की नींव तमाम हुई।
सड़कों पर जब सैलाब आया
सत्ता की मुश्किल आम हुई।


क्या तुम डर गए?
अभी-नहीं…
शाम हुई और तुम घर गए!


हाथों में जब किताबें थीं,
आँखों में जब अरमान थे,
सवाल लिए जब छात्र खड़े,
क्यों उन पर इल्ज़ाम थे?

जिन्हें समझा था चुप कर देंगे,
उनकी आवाज़ सरेआम हुई।
जिन्हें समझा था रोक देंगे
उनसे सत्ता बदनाम हुई

क्या तुम डर गए?
अभी -नहीं…
शाम हुई और तुम घर गए!

जब छात्रों ने प्रश्न किया,
सत्ता की बोलती बंद हुई।
किताबें लेकर छात्र चले,
सत्ता की शिकस्त हुई।

लाठी आई, डर न आया,
छात्रों की आवाज़ जवान हुई।
सवालों से जब सत्ता घिरी,
हर चाल उसकी नाकाम हुई।

क्या तुम डर गए?
अभी-नहीं…
शाम हुई और तुम घर गए!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर