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गिरते पत्थर, गिरती इंसानियत

Ranjana Sood

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अब तो पहाड़ों के पत्थर भी सहम गए हैं,
        
                                                    
                            
जो सदियों से राहें बनाते थे इंसानों के वास्ते।
अपनी ही हस्ती मिटाकर,
हर सफ़र को आसान बनाते रहे।
आज वही आदमजात के बेरहम हाथों से
उन्हीं गहरी खाइयों में धकेले जा रहे हैं।
मगर सुनो—
पहाड़ तो आज भी अडिग खड़े हैं,
पर अफ़सोस...
इंसानियत
हर रोज़ किसी न किसी खाई में गिर रही है।
3 महीने पहले
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