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गिरते पत्थर, गिरती इंसानियत

                
                                                         
                            अब तो पहाड़ों के पत्थर भी सहम गए हैं,
                                                                 
                            
जो सदियों से राहें बनाते थे इंसानों के वास्ते।
अपनी ही हस्ती मिटाकर,
हर सफ़र को आसान बनाते रहे।
आज वही आदमजात के बेरहम हाथों से
उन्हीं गहरी खाइयों में धकेले जा रहे हैं।
मगर सुनो—
पहाड़ तो आज भी अडिग खड़े हैं,
पर अफ़सोस...
इंसानियत
हर रोज़ किसी न किसी खाई में गिर रही है।
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3 महीने पहले

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