रो रही है धरती
चीखती और चिल्लाती है
जख्म हमने इतना दिया
हंसते हुए यूंही सह जाती है।
कभी उसके श्रृंगार उजाड़ें
कभी तन को बेरहमी से खरोचा है
जुर्म किए हमने इतने
इसकी सुंदरता को भी नोचा है।
जिसके गोद में सोए हम
जिसकी मिट्टी में हमने लीला रचाया है
जिसके इतने उपकार है हमपर
आज उसी धरा को वीरान बनाया है।
जिसने अन्न दिया पेट भरने को
जिसने दिया सतह रहने को
कितने घाव दिए हमने बदन पर उसके
तड़पता छोड़ दिया हमने उसे मरने को।
कितने उपहास सहे हमारे
कितने दर्द को भी झेले है
उसी धरा का कातिल बना मानव
जिसके गोद में उसने खेले है।
- रणधीर वर्मा