स्त्री यदि स्वयं को लिखती है तो वह त्याग एवं बलिदान के एवज में प्रेम, स्वाभिमान ,साहस और स्वतंत्रता लिखती
वह नकारती लोक लाज, परंपरा ,रीति रिवाज और संस्कार के नाम पर बंधी बेड़ियां
अपने लिए एक स्वतंत्र उड़ान लिखती
वह नहीं लिखती स्वयं को पुरुष के आधीन , स्वयं की पहचान लिखती
नहीं लिखती वह स्वयं को बेबस, लाचार ,अबला और भावुक स्त्री
सशक्त ,प्रबल ,प्रखर ,अटल चित्र और वज्र संकल्प सा लिखती
वह नहीं लिखती स्वयं को फूल सी कोमल, नाजुक और असहाय स्त्री
वह लिखती तो निर्भीक साहसी और विवेकशील लिखती
स्वयं किसी की बेटी ,पत्नी ,बहन और मां भर नहीं
इन रिश्तो से पहले अपना अस्तित्व लिखती
नहीं लिखती वह अपने लिए मौन ,वेदना और आंसू वह विद्रोह, उल्लास और मुस्कान लिखती
वह नहीं लिखती चुप रहकर सब सहना
उन व्यंग भरी बातों को सुनना
फिर भी सबसे हंसकर मिलना
वह मुखर होती और जवाब लिखती
वह नहीं लिखती स्वयं को देवी
वह लिखती तो पहले ’इंसान' लिखती
ये घर भी उसका नहीं
वो घर भी उसका नहीं
वह लिखती तो अपना एक घर लिखती
सबको स्नेह बांटने वाली
प्रेम की फूल खिलाने वाली
ममता का अर्थ बताने वाली
अंधेरे में दीप जलाने वाली
स्वयं को यूं प्रकाशहीन कभी न लिखती
स्त्री यदि स्वयं को लिखती तो वह कुछ ऐसा लिखती...