प्रेम है उस जीवन का आधार जिस जीवन के लिए सिर्फ जीवन ही है पर्याप्त जी,
और प्रेम उस मौत से भी अछूता नहीं जो मौत सब कुछ कर देती है समाप्त जी,
सचमुच वह मनुष्य जीवन और मृत्यु से पूर्णतः ऊपर उठ चुका होता है जिसने,
महसूस कर लिया है उस प्रेम को जो एक समान रूप से सब जगह है व्याप्त जी|
-मनस्व