गिद्ध दिलावर
किधर गए तुम गिद्ध बेचारे!
इधर-उधर सब खोज रहे हैं,
जन मानस सब पूछ रहें हैं।
पीपल की ऊंची डाली पर वास,
नहीं दिखे जन हुए उदास ।
किधर गए तुम गिद्ध बेचारे!
बच्चे देख डर जाते थे,
कुछ डंडे लेकर दौड़ाते थे।
वे क्या जाने तेरी कीमत,
अब क्यों कोस रहे सब किस्मत।
किधर गए तुम गिद्ध बेचारे!
लगता नहीं यह भाता देश,
इसमें बढ़ गया आपसी द्वेष।
सभ्यता को लोग फोड़ गए,
अब तुमसे नाता तोड़ गए।
किधर गए तुम गिद्ध बेचारे!
करते थे परिवेश सफाया,
ऐसा नेक धर्म तूने पाया।
मिनटों में कर देते काम,
अब तो वे सड़ते खुलेयाम।
किधर गए तुम गिद्ध बेचारे!
पर्यावरण की छेड़छाड़ से,
तभी भागे सब छोड़छाड़ के।
इस पर मैं शर्माता हूँ,
तुमको फिर से बुलाता हूँ।
किधर गए तुम गिद्ध बेचारे!
"रमेश सिंह यादव" ( प्रकृतप्रेमी)
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