जिनके आचराणों के किस्से कैंची जैसे हों,
कैसे उनको गाँव कहें जो दिल्ली जैसे हों।
नहीं सुरक्षा हो पायेगी गन्ध-भरे वन की
काटी जायेगी डाली-टहनी तक चन्दन की,
लोगों के व्यक्तित्व जहां पर केंची जैसे हों।
जब हम सो जाएंगे मीठे सपने देखेंगे
वे घर के तालों के लीवर-हुड़के ऐंठेंगे,
क्या उनसे उम्मीद रखें जो चाभी जैसे हों।
तय है वातावरण शोक-करुणा तक जायेगा
कौन हंसेगा और ठहाके कौन लगायेगा?
परिचय के संदर्भ जहां पर अर्थी जैसे हों।
वहां आदमीयत को पूजा कभी न जायेगा
कदम-कदम पर सच स्वारथ से मातें खायेगा,
जहां रूप-आकार मनुज के कुर्सी जैसे हों।
-रमेशराज