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एक गीत

                
                                                         
                            जिनके आचराणों के किस्से कैंची जैसे हों,
                                                                 
                            
कैसे उनको गाँव कहें जो दिल्ली जैसे हों।

नहीं सुरक्षा हो पायेगी गन्ध-भरे वन की
काटी जायेगी डाली-टहनी तक चन्दन की,
लोगों के व्यक्तित्व जहां पर केंची जैसे हों।

जब हम सो जाएंगे मीठे सपने देखेंगे
वे घर के तालों के लीवर-हुड़के ऐंठेंगे,
क्या उनसे उम्मीद रखें जो चाभी जैसे हों।

तय है वातावरण शोक-करुणा तक जायेगा
कौन हंसेगा और ठहाके कौन लगायेगा?
परिचय के संदर्भ जहां पर अर्थी जैसे हों।

वहां आदमीयत को पूजा कभी न जायेगा
कदम-कदम पर सच स्वारथ से मातें खायेगा,
जहां रूप-आकार मनुज के कुर्सी जैसे हों।
-रमेशराज
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2 महीने पहले

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