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एक तेवरी

Ramesh Raj

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तभी बिखेरे बाती नूर, ये दस्तूर
        
                                                    
                            
मोम सरीखा गल प्यारे ।

दुःखदर्दों से किसकी मुक्ति? कोई युक्ति??
क्या होना है कल प्यारे?

अब तू जिस संकट के बीच, भारी कीच
थोड़ा-बहुत निकल प्यारे ।

रैंग, हुआ जो पाँव विहीन, बनकर दीन
सर्प सरीखा चल प्यारे ।

जग में उल्टे-सीधे काम, ओ बदनाम
क्यों करता है छल प्यारे ।
-रमेशराज
एक घंटा पहले
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