आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

एक तेवरी

                
                                                         
                            तभी बिखेरे बाती नूर, ये दस्तूर
                                                                 
                            
मोम सरीखा गल प्यारे ।

दुःखदर्दों से किसकी मुक्ति? कोई युक्ति??
क्या होना है कल प्यारे?

अब तू जिस संकट के बीच, भारी कीच
थोड़ा-बहुत निकल प्यारे ।

रैंग, हुआ जो पाँव विहीन, बनकर दीन
सर्प सरीखा चल प्यारे ।

जग में उल्टे-सीधे काम, ओ बदनाम
क्यों करता है छल प्यारे ।
-रमेशराज
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
53 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर