तभी बिखेरे बाती नूर, ये दस्तूर
मोम सरीखा गल प्यारे ।
दुःखदर्दों से किसकी मुक्ति? कोई युक्ति??
क्या होना है कल प्यारे?
अब तू जिस संकट के बीच, भारी कीच
थोड़ा-बहुत निकल प्यारे ।
रैंग, हुआ जो पाँव विहीन, बनकर दीन
सर्प सरीखा चल प्यारे ।
जग में उल्टे-सीधे काम, ओ बदनाम
क्यों करता है छल प्यारे ।
-रमेशराज
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