विज्ञापन

एक तेवरी

Ramesh Raj

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रति-लेखन हैं टुकड़े-टुकड़े,मधुवाचन हैं टुकड़े-टुकड़े,
        
                                                    
                            
सबके मन है टुकड़े-टुकड़े,चहके जन हैं टुकड़े-टुकड़े।

अब लोग यहाँ मिल के न मिलें, खिल के न खिलें, घुल के न घुलें
मधु-से मन हैं टुकड़े-टुकड़े, घर-आँगन हैं टुकड़े-टुकड़े।

पलकें न झुकें, पलकें न उठें, वह ओज दिखे न सरोज दिखे
अवलोकन हैं टुकड़े-टुकड़े, अब लोचन हैं टुकड़े-टुकड़े।

इत आफत में वृषभान लली, दुःख में रतिरीति लगे न भली
उद्बोधन हैं टुकड़े-टुकड़े,
उत मोहन हैं टुकड़े-टुकड़े।
 
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all