रति-लेखन हैं टुकड़े-टुकड़े,मधुवाचन हैं टुकड़े-टुकड़े,
सबके मन है टुकड़े-टुकड़े,चहके जन हैं टुकड़े-टुकड़े।
अब लोग यहाँ मिल के न मिलें, खिल के न खिलें, घुल के न घुलें
मधु-से मन हैं टुकड़े-टुकड़े, घर-आँगन हैं टुकड़े-टुकड़े।
पलकें न झुकें, पलकें न उठें, वह ओज दिखे न सरोज दिखे
अवलोकन हैं टुकड़े-टुकड़े, अब लोचन हैं टुकड़े-टुकड़े।
इत आफत में वृषभान लली, दुःख में रतिरीति लगे न भली
उद्बोधन हैं टुकड़े-टुकड़े,
उत मोहन हैं टुकड़े-टुकड़े।
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