कागज के इन पन्नो पर, मै अपना थकान लिखूँगा
मिट्टी के हर एक कण पर,मै अपना अरमान लिखूँगा
लहरातें हो खेती चाहे,हो ऊँचे पर्वत नदियाँ
भारत माता के माथे पर, मैं हूँ एक किसान लिखूँगा,
ठण्डी गरमी या वर्षा हो, हर मौसम आसान लिखूँगा
मजबूत इरादों को अपने,मैं आँधी और तूफान लिखूँगा
माना कि जीवन मेरा संधर्षो से है भरा हुआ
हो जीत मेरा या हार मेरा, इसको अपना स्वाभिमान
लिखूँगा,
भारत माता के माथे पर, मैं हूँ एक किसान लिखूँगा,
जीवन हो एक पल का ही, मैं उसका भी एहसान लिखूँगा
थक कर भी न थकने वाला, खुद को मै इंसान लिखूँगा
भूखे प्यासे दीन हीन का, नीर निवाला जो छीने
ऐसे में जो जैसे भी हो,उनको न भगवान लिखूँगा
भारत माता के माथे पर, मैं हूँ एक किसान लिखूँगा,
-रामवृक्ष बहादुरपुरी