आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

किसान पर कविता

                
                                                         
                            कागज के इन पन्नो पर, मै अपना थकान लिखूँगा
                                                                 
                            
मिट्टी के हर एक कण पर,मै अपना अरमान लिखूँगा
लहरातें हो खेती चाहे,हो ऊँचे पर्वत नदियाँ
भारत माता के माथे पर, मैं हूँ एक किसान लिखूँगा,

ठण्डी गरमी या वर्षा हो, हर मौसम आसान लिखूँगा
मजबूत इरादों को अपने,मैं आँधी और तूफान लिखूँगा
माना कि जीवन मेरा संधर्षो से है भरा हुआ
हो जीत मेरा या हार मेरा, इसको अपना स्वाभिमान
लिखूँगा,
भारत माता के माथे पर, मैं हूँ एक किसान लिखूँगा,

जीवन हो एक पल का ही, मैं उसका भी एहसान लिखूँगा
थक कर भी न थकने वाला, खुद को मै इंसान लिखूँगा
भूखे प्यासे दीन हीन का, नीर निवाला जो छीने
ऐसे में जो जैसे भी हो,उनको न भगवान लिखूँगा
भारत माता के माथे पर, मैं हूँ एक किसान लिखूँगा,
-रामवृक्ष बहादुरपुरी
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर