ऋतंभरा! तुम कौन हो?
भोर की पहली किरण हो,
या चेतना का स्पंदन हो?
मौन साधना के अंतर में
गूँजता हुआ अभिनंदन हो?
तुम सत्य-सुधा की निर्मल धारा,
तुम ज्ञान-दीप की उजली ज्योति,
तुम तम के वक्षस्थल पर लिखती
आशा की स्वर्णिम अमिट पंक्ति।
जहाँ विचार विमूढ़ खड़े हों,
जहाँ प्रश्न अनुत्तरित रहते,
जहाँ सत्य के पथ पर चलने से
पग-पग पर संशय आ घेरे,
वहाँ तुम्हारी प्रज्ञा जागे,
अंतर के सब द्वार उघेरे।
तुममें करुणा, तुममें विवेक,
तुममें निर्मल भाव समाहित,
तुममें मानवता का गौरव,
तुममें जीवन का सत्य प्रतिष्ठित।
ऋतंभरा! तुम नाम नहीं हो,
एक दिव्य अनुभूति हो,
ज्ञान, सत्य और चेतना की
अविरल बहती ज्योति हो।
जब मन का दर्पण स्वच्छ बनेगा,
जब अहंकार विलीन होगा,
तब सत्य स्वयं मुखरित होगा,
अंतर आलोकित, नवीन होगा।
आओ, मन में तुम्हें जगाएँ,
सत्य-साधना का दीप जलाएँ,
ज्ञान बने जीवन का पथ-प्रदर्शक,
करुणा से संसार सजाएँ।
ऋतंभरा! तुममें ही निहित है
सत्य-बोध का दिव्य उजास,
तुमसे ही जीवन सार्थक हो,
तुमसे ही चेतना का विकास।