संस्कारों की गोदी में पला, हर घर एक दीप समान,
मूल्यों की महक से महका, रिश्तों का वो मधुर गान।
धन-दौलत से ना आँका गया, उस घर का गौरव यथार्थ,
जहाँ नियम, विश्वास, स्नेह में, बसती थी जीवन की बात।
हज़ारों वर्षों की यह थाती, केवल ईंटों का ढेर नहीं,
यह मानवता की वह परिभाषा, जो दिल से जाती कहीं।
जहाँ जननी के आँचल तले, हर धर्म, हर रंग समाए,
वो भारत की संयुक्त परंपरा, जो जग को भी अपनाए।
राजतंत्र रहा या लोकतंत्र, परिवार रहा मूल विचार,
व्यक्ति नहीं अकेला चलता, संग चलता है संसार।
रिश्तों की मिठास बनी रहे, व्यवहार बना सच्चा धर्म,
घर-घर में हो संवाद ऐसा, बहे जहाँ प्रेमों का मर्म।
"वसुधैव कुटुंबकम्" की ध्वनि, केवल श्लोक नहीं संदेश,
यह विचार नहीं केवल भारतीय, यह तो मानवता का वेश।
हर रंग, हर संस्कृति को हम, अपनाने को तैयार रहे,
सद्भावना का दीप जलाकर, दुनिया में उजियार करें।
नारी है इस गाथा की रचना, उसका सम्मान अनमोल,
परंपरा में पूजी गई वह, फिर क्यों मिले उसको केवल बोल?
सम्मान जहाँ समता से हो, वह घर बनता है मंदिर,
नारी के दृष्टिकोण से ही, बने सृष्टि का हर अक्षर।
परिवार नहीं केवल दीवारें, वह है संस्कारों की छाँव,
जिसमें पलता है हर इंसान, पाता है जीवन की ठाँव।
जो इस एकता को संजोए, वह सच्चा मानव कहलाए,
और जो तोड़े बंधन इसके, वह अंततः खुद ही पछताए।
तो आओ मिलकर करें प्रण, इस धरोहर को बचाएं,
मूल्यों की मूरत फिर से, अपने जीवन में अपनाएं।
संयुक्तता में जो शक्ति है, वो दुनिया को राह दिखाए,
परिवारों की इस संस्कृति को, फिर से स्वर्णिम बनाएँ।