वो झांकती हैं, डायरी के पन्नों से
और ताकती हैं, मेरी कलम और शब्दों को...
अपने अधूरेपन की दुहाई देती,
बार-बार बुलाती है मुझे...
बहुत अरसे से मिला नहीं मैं उनसे,
या शायद मिला नहीं मैं खुद से...
बेबस सा, बस मैं...
अपनी व्यस्तताओं के बहाने,
बना रखी हैं दूरियां उनसे...
अपराधबोध सा मैं...
नजर नहीं मिला पा रहा हूं, खुद से...
देता रहता हूं दिलासा उनको,
या कि खुद को झूठी तसल्ली,
कि कल से बदल दूंगा खुद को
और सम्भालूंगा तुम्हें...
पर वह कल, आज में तब्दील तो हो...
मलाल है मुझे, उनके अधूरेपन का
या अफसोस मुझे कि मैं अभी कुछ बन नहीं पाया...
और सपनों के लिए जिया नहीं...
ये अधूरी कविताएं नहीं,
अधूरे सपने हैं मेरे...
जो सोने भी नहीं देते चैन से मुझे...
थक सा गया हूं, मगर टूटा नहीं...
निराश हूं थोड़ा, मगर हारा नहीं...
यकीन है मुझे, फिर से कलम उठाऊंगा..
और कर दूंगा मुकम्मल
मेरी अधूरी कविताओं को...